हम आज़ाद हैं ।

जामा मस्जिद के समीप एक मार्किट है । यहां पिंजरा बन्द पक्षी मिलते हैं । गत वर्ष एक मित्र के साथ वहां जाना हुआ था । मित्र की बिटिया की फरमाईश एक पिंजरा बन्द “मियां मिठ्ठू” की थी।

मार्किट में पहुंचे तो दृश्य बड़ा डरावना सा था। अलग अलग तरह के पक्षी थे और सबमें एक समानता थी । सब पिंजरे में कैद थे ।

मित्र ने एक मियां मिट्ठू पसन्द किया । थोड़ा बहुत मोल भाव हुआ और बात बन गयी ।

मुझसे भी कहा गया पर मैंने पिंजरा बन्द पक्षी खरीदने से इनकार कर दिया ।

हम जाने को थे के नज़र एक परिंदे पर पड़ी । असल में इंसान के अलावा सभी जानवरों की आंखों में मासूमियत दिखाई देती है । मुझे तो खूंखार शेरनी भी अपने शावकों को सहलाती बड़ी मासूम दिखाई पड़ती है । एक इंसान ही है जिसकी आंखों में मासूमियत ढूंढ पाना नामुमकिन है।

बरहाल , नज़र ऐसी पड़ी के उसे पिंजरे में बंधा हुआ देखना बर्दाश्त से बाहर हो गया । पुनः मोलभाव हुआ । बात बन गयी और एक पिंजरा और हमारे हाथों में आ गया ।

फिर हृदय में एक उत्सुकता ने जन्म लिया । मैंने चिड़िया बेचने वाले मुल्ला जी से कहा के मुझे किसी छत का रास्ता दिखा दें । असल में मेरी इच्छा उस पिंजरे को सीधा आसमान की ओर खोलने की थी ।देखने की उत्सुकता थी के जब बेड़ियां टूटती हैं तो परिंदा कितने वेग से उड़ान भरता है ।

बिल्कुल पड़ोस में मुल्ला जी का मकान था । संकरी सी सीढ़ियों के सहारे हम छत तक पहुंच गए । छत के एक कोने में पिंजरे को रखा और मुल्ला जी से पिंजरे का ताला खोलने को कहा ।

मुल्ला जी ने एक बार अजीब सी संशय भरी नज़रों से देखा ।जब पलट कर मैंने भी पिंजरा खोलने का इशारा किया तो उसे लगा के किसी उच्च कोटि के पागल से पाला पड़ा है । मैं एक मन मोहने वाले दृश्य का साक्षी बनने वाला था । पिंजरा खुला । मुल्ला जी ने बड़ी बेरहमी से पक्षी को गर्दन से पकड़ कर बाहर निकाला । एक बार को सांस थम गई।

अगले कुछ क्षण में मुझे वह परिंदा आज़ाद आसमान की सैर करता दिखने वाला था ।

फिर कुछ ऐसा हुआ जो सोच और समझ के बाहर था। स्वछंद आकाश में खड़ा परिंदा पिंजरे के बाहर खड़ा हो गया । कंभी इधर निहारता कभी उधर । कभी दाएं देखता कभी बाएं। फिर एकदम पिंजरे की ओर देखने लगा । हम विस्मय से भर गए ।

आज़ाद परिंदे को उड़ने में आख़िर क्या परेशानी है । मामला समझ से बाहर हुआ तो मुल्ला जी बोल पड़े ” अभी अभी बाहर आया है , एक दम नहीं उड़ेगा । बहुत वक्त से बंद था । ”

हुआ भी कुछ ऐसा ही । ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह अपनी स्वछंदता को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। थोड़ा पंख खोलता फिर ज़मीन पर टिक जाता । ऐसा लगा मानो अपने ऊपर स्वछंद आसमान को नहीं अपने आसपास की बेड़ियों को तालाश रहा हो जिसमें वह वर्षों से बंधा रहा है ।

अंततः मुल्ला जी ने अपने हाथों में लिया । आसमान की ओर उसका चेहरा किया और छोड़ दिया । कुछ समय पश्चात वह आंखों से ओझल हो गया।

ईमानदारी से कहूं तो उसके स्वछंद होने का आनंद मैं नहीं ले पाया । ग़ुलामी मानसिकता को किस कदर प्रभावित कर सकती है । परिंदा जिसके पंख हैं , जो आकाश का हर एक कोना नापने में सक्षम है , वह अपने इर्द गिर्द लगे पिंजरे की छाया से बाहर नहीं निकल पाता ।

हम सब आज़ाद परिंदे हैं या किसी विचारधारा के गुलाम हैं ?

गुलामी अगर गहरी हो तो आज़दी के बाद भी गुलामी के अंश बाकी रह जाते हैं । भगतसिंह / आज़ाद / सुभाष बोस और न जाने कितने क्रांतिकारी गुलाम होकर भी अपने आप को आज़ाद मानते रहे ।

आज के आज़ाद हिंदुस्तान में न जाने कितने ऐसे हैं जो आज़ाद भारत में भी मानसिक गुलाम की ज़िंदगी जी रहे हैं । किसी दल , किसी वाद , किसी विचारधारा के गुलाम हैं । खोखली आस्था और रूढ़िवाद के गुलाम हैं ।

आपकी स्वछंद सोच पर बेड़ियां डालने वाला कोई दूसरा नहीं शायद हम स्वयं हैं । ऊपर खुला आकाश है और हमारी बेड़ियों में लगे ताले की चाबी हमारे हाथ में है।

इन बेड़ियों को काट , अपने अंतर्मन और अंतरात्मा को मुक्त करने का समय है । किसी की उधार दी गयी विचारधारा के बोझ को अपने कांधों से फेंक देने का समय है । किसी और को नहीं स्वयं को बताने का समय है के हम आज़ाद हैं ।

दोहराता रहूंगा ….

कोई भी विचारधारा स्वतंत्र नहीं होती।
स्वतंत्र विचार की कोई धारा नहीं होती।